Saturday, March 28, 2026

संघ किरण घर घर देने को अगणित नंदादीप जले,

 

संघ किरण घर घर देने को अगणित नंदादीप जले,
मौन तपस्वी साधक बन कर हिमगिरि से चुपचाप गले ॥धृ॥

नई चेतना का स्वर दे कर जनमानस को नया मोड दे,
साहस शौर्य हृदय मे भर कर नयी शक्ति का नया छोर दे,
संघशक्ति के महा घोष से असुरो का संसार दले ॥१॥


परहित का आदर्श धार कर परपीडा को ह्रिदय हार दे,
निश्चल निर्मल मन से सब को ममता का अक्षय दुलार दे,
निशा निराशा के सागर मे बन आशा के कमल खिले ॥२॥

जन मन भावुक भाव भक्ति है परंपरा का मान यहा,
भारत माँ के पदकमलो का गाते गौरव गान यहा,
सब के सुख दुख मे समरस हो संघ मन्त्र के भाव पले ॥3॥


 

Saturday, March 7, 2026

दुर्लभ जन्म मिला भारत में, धन्य-धन्य अपना जीवन

 

दुर्लभ जन्म मिला भारत में,
धन्य-धन्य अपना जीवन, करें साधना और सघन,
करें साधना और गहन । || धृ ||

ज्ञानशील के पावन पथ पर, हो निर्भय बढ़ते जाएं,
व्यक्ति व्यक्ति का हृदय जीतकर,
सुगठित शक्ति प्रकटाए,
गूंज उठेंगे धरा गगन || 1 ||

निज गुणवत्ता और निखारे, राष्ट्र समर्पित भाव प्रबल,
कर्म तपस्या चले निरंतर, व्यर्थ न जाए कोई पल,
सजग रहे और करें मनन, || 2 ||

कोई कष्ट चुनौती आए, शुभ अवसर में बदलेंगे,
पद लिप्सा मिथ्या आकर्षण,
हम न कभी भी फिसलेंगे,
रहे सदा निर्लिप्त प्रसन्न, || 3 ||

मर्द आम्हीच हिंदू खरे, दुश्मनाना भरे कापरे

 

मर्द आम्हीच हिंदू खरे, दुश्मनाना भरे कापरे
देश रक्षाव्या, धर्म तारव्या
कोण झुंझात मागे उरे || धृ ||

भारता आम्ही तुलाच देव मानतो
हाच हिंदू धर्म एक जाणतो
सांगतो महान आमुची परंपरा
रक्त शिंपूनी पवित्र ठेवितो धरा
याच भूमीवरी, प्राण गेला तरी
आमुची वीरगाथा उरे || 1 ||

व्हा पुढे आम्हा धनाजी बाजी सांगती
मर्द हो उठा कडाडतात नौबती
राजपूत कधी ना संगरातूनी हटे
मारुनी दहास एक मराठे कटे
सिंधु ओलांडूनी धावती संगिनी
पाय आता न मागे सरे || 2 ||

वादळापरी आम्ही पुढेच चालतो
जय शिवाजी गर्जुनी रणात झुंझतो
घोष दुमदुमे हा पुन्हा दिगंतरी
पूर्वाजा परी अजिंक्य दिव्य संगीरी
घेऊ शत्रूवरी झेप वाघापरी
मृत्यू आम्हा पुढे घाबरे ||
3 ||

मातृभुमि गान से गूंजता रहे गगन

 

मातृभुमि गान से गूंजता रहे गगन
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥।धृ।
जन्मसिद्ध भावना स्वदेश का विचार हो
रोम रोम मे रमा स्वधर्म संस्कार हो
आरती उतारते प्राणदीप हो मगन,
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥१॥

हार के सुसुत्र मे मोतियों की पंक्तियाँ
ग्राम, नगर, प्रांत से संगठित शक्तीयाँ
लक्ष लक्ष रुप से राष्ट्र हो विराट तन
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥२॥

ऎक्य शक्ति देश की प्रगति मे समर्थ हो
धर्म आसरा लिये मोक्ष काम अर्थ हो
पूण्यभुमी आज फिर ज्ञान का बने सदन
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥३॥

देश हमे देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे

 

देश हमे देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे ॥धृ॥

सूरज हमे रोशनी देता, हवा नया जीवन देती है
भूख मिटाने को हम सब की, धरती पर होती खेती है
औरों का भी हित हो जिसमे,
हम ऐसा कुछ करना सीखे ॥१॥

गरमी की तपती दुपहर मे, पेड सदा देते है छाया
सुमन सुगन्ध सदा देते है, हम सबको फूलों की माला
त्यागी तरुओं के जीवन से
हम परहित कुछ करना सीखे ॥२॥

जो अनपढ है उन्हे पढ़ाए, जो चुप है उनको वाणी दे
पिछड गये जो उन्हे बढाये, समरसता का भाव जगा दे
हम मेहनत के दीप जलाकर,
नया उजाला करना सीखे ॥३॥

संघटन गढे चलो सुपंथ पर बढे चलो

 

संघटन गढे चलो सुपंथ पर बढे चलो ।
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किए चलो ॥धृ॥

युग के साथ मिलके सब कदम बढ़ाना सीख लो ।
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो – 2
भूल कर भी मुख पे जाती-पंथ की न बात हो
भाषा प्रांत के लिये कभी न रक्त पात हो
फूट का बड़ा घड़ा है फोड कर बढे चलो ॥१॥

आ रही है आज चारों ओर से यही पुकार
हम करेंगे त्याग मातृभूमी के लिये अपार - 2
कष्ट जो मिलेंगे मुस्कुरा के सब सहेंगे हम
देश के लिये सदा जियेंगे और् मरेंगे हम
देश का ही भाग्य अपना भाग्य है ये सोच लो ॥२॥

श्रद्धामय विश्वास बढ़ाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें।

 

श्रद्धामय विश्वास बढ़ाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें।
अपने प्रेम परिश्रम के बल, भारत में नव सूर्य उगायें।।
जाग रहा है जन-गण-मन! निश्चित होगा परिवर्तन… ।।ध्रु।।

शुद्ध सनातन परम्परामय, प्रेम भरा व्यवहार रहे।
ऋषि-मुनियों की शिक्षाओं पर, चलने का संस्कार रहे।।
राह रपटती इस दुनिया में, कुल-कुटुम्ब का संरक्षण
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।१।।

सब समाज अंगांग परस्पर, छुआछूत लवलेश न हो।
प्रीति-रीति भर गहन सभी में, भेदभाव अवशेष न हो।।
बनें परस्पर पूरक-पोषक, हृदयों में रस-धार सृजन
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।२।।

हरी-भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण।
पंच तत्व की मंगल महिमा, दिव्य धरा के आभूषण।।
पुरखों के विज्ञान-धर्म की, परम्परा का करे वरण
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।३।।

स्वाभिमान भर, भाव स्वदेशी,
स्वत्व बोध का लें आधार।
परहित ध्यान परस्पर पूरक,
जन-जीवन का शिष्टाचार।।
विश्व मंच पर भारत मां के,
यश की हो अनुगुंज सघन ,
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।४।।

बने हम हिंदके योगी , धरेंगे ध्यान भारतका

 

बने हम हिंदके योगी , धरेंगे ध्यान भारतका ।
उठाकर धर्म का झंडा, करे उत्थान भारत का ।।ध्रु।।

गले में शील की माला, पहनकर ज्ञान की कफनी ।
उठाकर त्याग का झंडा, रखेंगे मान भारत का ।।१।।

जलाकर कष्ट की होली, उठाकर इष्ट की झोली ।
जमाकर संत की टोली, करे उत्थान भारत का ।।२।।

स्वरो में तान भारत की, है मुख में आन भारत की ।
नसो मे रक्त भारत का, नयन में मूर्ति भारत की ।।३।।

हमारे जन्म का सार्थक, हमारे मोक्ष का कारण ।
हमारे स्वर्ग का साधन, यही उत्थान भारत का ।।४।।

भारत हिन्दुस्थान है, हिन्दुओं की शान है

 

भारत हिन्दुस्थान है, हिन्दुओं की शान है
भगवन का वरदान है
झंडा हिन्दु राष्ट्र का झंडा भारत वर्ष का॥ ।।ध्रु।।

हिन्दु ऐसे वीर है, कई करोडो तीर है
लढने मे रणवीर है
झंडा हिन्दुराष्ट्र का झंडा भारत वर्ष का ॥1||

सप्तसिंधू मे स्नान करेंगे, रक्तबिन्दु का दान करेंगे,
फिर भी कभी नही झुकने देंगे
झंडा हिन्दुराष्ट्र का झंडा भारत वर्ष का ॥2||

दुष्मन की पुकार है, कमर मे जब तलवार है,
रणमे लोहा लाल है
झंडा हिन्दु राष्ट्र का झंडा भारत वर्ष का ||3||

व्यक्ती व्यक्ती मे जगाये राष्ट्र चेतना

 

व्यक्ती व्यक्ती मे जगाये राष्ट्र चेतना
जनमन संस्कार करे यही साधना ।
साधना नित्य साधना, साधना अखंड साधना ॥ध्रु॥

नित्य शाखा जान्हवी पुनीत जलधरा
साधना की पुण्यभूमी शक्ती पीठीका
रजः कणों में प्रकटें दिव्य दीप मालीका
हो तपस्वी के समान संघ साधना ॥१॥

हे प्रभु तू विश्व की अजेय शक्ती दे
जगत हो विनम्र ऐसा शील हमको दे
कष्ट से भरा हुआ ये पंथ काटने
ज्ञान दे की हो सरल हमारी साधना ॥२॥

विजयशाली संघबद्ध कार्यशक्ती दे
तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा हमको दे
हिंदु धर्म रक्षणार्थ वीर व्रत स्फ़ुरे
तव कृपा से हो सरल हमारी साधना ॥३॥

अब जाग उठो कमर कसो

 

अब जाग उठो कमर कसो
मंजिल की राह बुलाती है
ललकार रही हमको दुनिया
बेरी आवाज लगाती है || ध्रु ||


है ध्येय हमारा दूर सही
पर साहस भी तो क्या कम है
हम राह अनेकों साथी है
कदमों में अंगद का दम है
असूरों की लंका राख़ करें
वह आग लगाने आती है || 1 ||

पग पग पर कांटे बिछे हुवे
व्यवहार कुशलता हममे हैं
विश्वास विजय का अटल लिए
निष्ठा कर्मठता हममे हैं
विजयी पुरखों की परंपरा
अनमोल हमारी थाती है || 2 ||


हम शेर शिवा के अनुगामी
राणा प्रताप की आन लिए
अर्जुन का शरसंधान लिए
संगठन तंत्र की शक्ति ही
वैभव का चित्र सजाती है || 3 ||

भारत हमारी माँ है, माता का रूप प्यारा

 

भारत हमारी माँ है, माता का रूप प्यारा
करना इसी की रक्षा, कर्तव्य है हमारा ॥धृ॥

जननी समान धरती, जिस पर जनम लिया है
निज अन्न वायु जल से, जिसने बड़ा किया है
जीवन वो कैसा जीवन, इसपे अगर न वारा ॥१॥

स्वरणिम प्रभात जिस की, अमृत लुटाने आए
जहाँ सांझ मुस्कुराकर, दिन की थकन मिटाए
दिन रात का चलन भी, जहाँ शेष जग से न्यारा ॥२॥

पावन पुनीत माँ का, मंदिर सहज सुहाना
फिर से लुटे न बेटो, तुम नींद मे न खोना
जागृत सुतों का बल ही, माँ का सदा सहारा ।४॥

धर्म के लिये जिये समाज के लिये जिये

 

धर्म के लिये जिये समाज के लिये जिये
ये धडकने ये श्वास हो पुण्यभूमी के लिये
कर्मभूमी के लिये ॥धृ॥

गर्व से सभी कहे, हिन्दु है हम एक है
जाति पंथ भिन्नता, स्नेह सूत्र एक है
शुभ्र रंग की छटा, सप्त रंग है लिये ॥१॥

कोटि कोटि कंठ से, हिन्दु धर्म गर्जना
नित्य सिद्ध शक्ति से, मातृभू की अर्चना
संघ शक्ति कलियुगे सुधा है धर्म के लिये ॥२॥

व्यक्ति व्यक्ति मे जगे, समाज भक्ति भावना
व्यक्ति को समाज से, जोडने की साधना
दांव पर सभी लगे, धर्म कार्य के लिये ॥३॥

एक दिव्य ज्योति से, असंख्य दीप जल रहे
कौन लो बुझा सके,, आंधियो मे जो जले
तेजःपुंज हम बढे तमस चीरते हुए ॥४॥

चन्दन है इस देश की माटी,



चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है ।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है । ॥धृ॥

हर शरीर मन्दिर सा पावन, हर मानव उपकारी है,
जहाँ सिंह बन गये खिलौने, गाय जहाँ माँ प्यारी है
जहाँ सबेरा शंख बजाता, लोरी गाती शाम है ॥ १॥

जहाँ कर्म से भाग्य बदलते, श्रमनिष्ठा कल्याणी है,
त्याग और तप की गाथाएँ, गाती कवि की वाणी है ।
ज्ञान जहाँ का गंगा-जल सा, निर्मल है अविराम है ॥२॥

इसके सैनिक समर भूमि में, गाया करते गीता है,
जहाँ खेत में हल के नीचे, खेला करती सीता है
जीवन का आदर्श जहाँ पर, परमेश्वर का धाम है ॥३॥


गलत मत कदम उठाओ

 

गलत मत कदम उठाओ
सोच कर चलॊ, विचार कर चलो
राह की मुसीबतों को पार कर चलो, पार कर चलो ॥धृ॥

हम पे जिम्मेदारियां है देश की बडी,
हम न बदले अपनी चाल हर घडी – घडी
आग ले चलो, चिराग ले चलो
ये मस्तियों कि रंग भरे फाग ले चलो, फाग ले चलो || 1 ||

मंजिल के मुसाफिर तुझे क्या राह की फिकर,
चट्टान पर तूफान के झोंको का क्या असर,
ये कौन आ रहा, अंधेरा छा रहा
ये कौन मंजिलों पे मंजिले उठा रहा, मंजिले उठा रहा || 2 ||