श्रद्धामय विश्वास बढ़ाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें।
अपने प्रेम परिश्रम के बल, भारत में नव सूर्य उगायें।।
जाग रहा है जन-गण-मन! निश्चित होगा परिवर्तन… ।।ध्रु।।
शुद्ध सनातन परम्परामय, प्रेम भरा व्यवहार रहे।
ऋषि-मुनियों की शिक्षाओं पर, चलने का संस्कार रहे।।
राह रपटती इस दुनिया में, कुल-कुटुम्ब का संरक्षण
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।१।।
सब समाज अंगांग परस्पर, छुआछूत लवलेश न हो।
प्रीति-रीति भर गहन सभी में, भेदभाव अवशेष न हो।।
बनें परस्पर पूरक-पोषक, हृदयों में रस-धार सृजन
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।२।।
हरी-भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण।
पंच तत्व की मंगल महिमा, दिव्य धरा के आभूषण।।
पुरखों के विज्ञान-धर्म की, परम्परा का करे वरण
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।३।।
स्वाभिमान भर, भाव स्वदेशी,
स्वत्व बोध का लें आधार।
परहित ध्यान परस्पर पूरक,
जन-जीवन का शिष्टाचार।।
विश्व मंच पर भारत मां के,
यश की हो अनुगुंज सघन ,
निश्चित होगा परिवर्तन… ।।४।।
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