मातृभुमि गान से गूंजता रहे गगन
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥।धृ।
जन्मसिद्ध भावना स्वदेश का विचार हो
रोम रोम मे रमा स्वधर्म संस्कार हो
आरती उतारते प्राणदीप हो मगन,
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥१॥
हार के सुसुत्र मे मोतियों की पंक्तियाँ
ग्राम, नगर, प्रांत से संगठित शक्तीयाँ
लक्ष लक्ष रुप से राष्ट्र हो विराट तन
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥२॥
ऎक्य शक्ति देश की प्रगति मे समर्थ हो
धर्म आसरा लिये मोक्ष काम अर्थ हो
पूण्यभुमी आज फिर ज्ञान का बने सदन
स्नेह नीर से सदा फुलते रहे सुमन ॥३॥
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