भारत हमारी माँ है, माता का रूप प्यारा
करना इसी की रक्षा, कर्तव्य है हमारा ॥धृ॥
जननी समान धरती, जिस पर जनम लिया है
निज अन्न वायु जल से, जिसने बड़ा किया है
जीवन वो कैसा जीवन, इसपे अगर न वारा ॥१॥
स्वरणिम प्रभात जिस की, अमृत लुटाने आए
जहाँ सांझ मुस्कुराकर, दिन की थकन मिटाए
दिन रात का चलन भी, जहाँ शेष जग से न्यारा ॥२॥
पावन पुनीत माँ का, मंदिर सहज सुहाना
फिर से लुटे न बेटो, तुम नींद मे न खोना
जागृत सुतों का बल ही, माँ का सदा सहारा ।४॥
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